मामला: श्रीराम बघेल बनाम गोपाल एवं अन्य
रिट याचिका क्रमांक: 28077/2021
न्यायालय: मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर खंडपीठ
न्यायाधीश: माननीय न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फडके
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर खंडपीठ ने श्रीराम बघेल बनाम गोपाल एवं अन्य मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए याचिकाकर्ता की याचिका को खारिज कर दिया है। यह याचिका भूमि के नामांतरण और बटांकन को लेकर दायर की गई थी, जिसमें 38 वर्षों की देरी से अपील की गई थी।
याचिकाकर्ता श्रीराम बघेल ने दावा किया था कि ग्राम मोहनपुर, मुरार स्थित भूमि (कुल 3.323 हेक्टेयर) पर अन्य सहभाजकों द्वारा उनकी जानकारी के बिना बटवारा कर नामांतरण करवा लिया गया, जो पूरी तरह से अवैध है। उन्होंने तहसील कार्यालय से जानकारी प्राप्त कर 2020-21 में अपील दायर की थी, जिसे समय-सीमा से बाहर होने के कारण खारिज कर दिया गया।
बाद में श्रीराम बघेल ने पुनरीक्षण याचिका अपर कलेक्टर ग्वालियर के समक्ष प्रस्तुत की, परंतु वह भी 23.11.2021 को अस्वीकृत कर दी गई। इस आदेश को चुनौती देते हुए उन्होंने उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की।
माननीय न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फडके की एकलपीठ ने यह स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता ने देरी का कोई समुचित और वैध कारण प्रस्तुत नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि 38 वर्षों की देरी को यूं ही स्वीकार नहीं किया जा सकता और यह न्यायिक प्रक्रिया के विरुद्ध है।
न्यायालय ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 227 के अंतर्गत केवल उन्हीं मामलों में हस्तक्षेप किया जा सकता है जहाँ किसी स्पष्ट विधिक त्रुटि या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ हो। इस मामले में ऐसा कुछ भी नहीं पाया गया।
अतः याचिका को “बिना किसी विधिक आधार और देरी से दायर” मानते हुए खारिज कर दिया गया।
विवाद का विषय:
- तहसीलदार द्वारा 08.11.1983 को किए गए बंटवारे के आदेश को याचिकाकर्ता ने 2021 में चुनौती दी।
- अपील SDO के समक्ष समय सीमा से बाहर होने के कारण खारिज।
- पुनरीक्षण अपर कलेक्टर द्वारा भी खारिज।
- पुनः रिट याचिका उच्च न्यायालय में दायर।
3. प्रासंगिक विधिक प्रावधान:
(क) मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 50:
यह धारा पुनरीक्षण की प्रक्रिया और उसकी सीमाओं से संबंधित है, जिसमें विशेष समयावधि में आवेदन किया जाना आवश्यक है।
(ख) भारतीय परिसीमा अधिनियम (Limitation Act), 1963 की धारा 5:
इसमें समय सीमा से बाहर दायर याचिकाओं को स्वीकार करने का प्रावधान है, यदि याचिकाकर्ता देरी के लिए उचित व ठोस कारण प्रस्तुत करे।
(ग) संविधान का अनुच्छेद 227:
इस अनुच्छेद के अंतर्गत उच्च न्यायालय अधीनस्थ न्यायाधिकरणों और न्यायालयों की कार्यवाही पर नियंत्रण रखता है, लेकिन इसका दायरा सीमित और विवेकाधीन होता है।
4. न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ:
- याचिकाकर्ता ने 38 वर्षों की देरी को सही ठहराने हेतु कोई ठोस कारण प्रस्तुत नहीं किया।
- केवल यह कहना कि “हाल ही में जानकारी मिली” — न्यायालय ने इसे अपर्याप्त माना।
- न्यायालय ने यह दोहराया कि न्यायालय की प्रक्रिया में निष्क्रियता को प्रोत्साहन नहीं दिया जा सकता।
- याचिकाकर्ता लगातार भूमि पर कब्जा किए हुए था, परंतु इतने वर्षों तक कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की गई, जो उदासीनता (negligence) को दर्शाता है।
5. प्रासंगिक उच्चतम न्यायालय निर्णयों का उल्लेख:
(i) Shalini Shyam Shetty v. Rajendra Shankar Patil (2010) 8 SCC 329:
“अनुच्छेद 227 के अंतर्गत उच्च न्यायालय केवल तब हस्तक्षेप करता है जब आदेशों में प्रत्यक्ष अन्याय, प्रक्रिया की घोर अनियमितता, या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हो।”
इस मामले में ऐसा कोई स्पष्ट उल्लंघन नहीं पाया गया।
6. न्यायालय का निष्कर्ष एवं आदेश:
- याचिका बिना विधिक आधार के पाई गई।
- याचिकाकर्ता की लापरवाहीपूर्ण व्यवहार पर टिप्पणी करते हुए याचिका को “sans merit” बताया गया।
- किसी भी प्रकार की प्राकृतिक न्याय की उपेक्षा या विधिक त्रुटि नहीं पाई गई।
- याचिका खारिज की गई।
7. विधिक महत्व:
- यह निर्णय स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि देरी से दायर याचिकाएं, यदि उचित कारण नहीं है, तो न्यायालय द्वारा स्वीकार नहीं की जाएंगी।
- न्यायिक प्रक्रिया में निष्क्रियता को प्रोत्साहन नहीं दिया जा सकता।
- यह निर्णय भूमि विवादों और नामांतरण मामलों में समय सीमा की अनुपालना के महत्व को रेखांकित करता है।
8. निष्कर्ष:
यह मामला न्यायिक देरी, प्रक्रिया की अनुपालना और निष्क्रियता के प्रभाव पर आधारित एक सशक्त उदाहरण है। उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि न्याय के लिए सक्रियता आवश्यक है और “नींद में पड़े दावे” न्याय की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।
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